मिरगी (दौरा पड़ना)का सफल इलाज़

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मिरगी आना (दौरा पड़ना ) क्या है?

मिरगी से आदमी सदा से आतंकित रहा है। दौरे के समय दिखने वाला उसका प्रकट रूप, अस्वाभाविक शारीरिक व्यवहार, यह सोच जगाता रहा है कि वह किसी प्रकार की अप्राकृतिक विपदा है। आदमी इसीलिए उसे भूत प्रेत, जादू-टोने और इष्टदेव के कुपित होने से जोड़ता आया है और उसके इलाज के लिए तरह-तरह के अवैज्ञानिक इलाज जैसे गंडा-ताबीज, झाड़-, फूँक दागना और शांति-पाठ आजमाता रहा है।

जब कि सच यह है कि दूसरे शारीरिक विकारों की तरह मिरगी भी तंत्रिकीय प्रणाली ( Nervous system) का एक विशिष्ट विकार है, जिसे स्वस्थ जीवन शैली और उपयुक्त दवाओं से जीता जा सकता है।

मिरगी क्या है what is Epilepsy?

मिरगी तंत्रिकीय प्रणाली का विकार है। इसमें मस्तिष्क के किसी भाग में अचानक जोर से विध्युत हलचल उठती है, जिससे शरीर पर से नियंत्रण टूट जाता है और कुछ क्षणों के लिए व्यवहार असामान्य हो जाता है।

Epilepsy

यह असामान्यता क्या रूप लेगी, यह इस पर निर्भर करता है कि विद्युत तरंगें मस्तिष्क के किस केंद्र में उठीं। मसलन मुख का नियंत्रण करने वाली मस्तिष्क की न्यूरॉन कोशिकाओं में यदि हलचल मचती है तो उसका असर मुख की मांसपेशियों पर दिखाई देता है। जब तक दौरा रहता है, उतनी देर के लिए उनमें लगातार रुक-रुक कर ऐंठन की लहर आती-जाती रहती है। शरीर के किसी एक अंग में सीमित होकर रह जाने वाली मिरगी फोकल एपिलेप्सी है।

लेकिन ज्यादातर मामलों में यह अचानक उठी विद्युत उथल-पुथल पूरे मस्तिष्क में फैल जाती है और पूरा शरीर इससे नहा उठता है। इसमें रुक-रुक कर ऐंठन का तेज दौरा पड़ता है। यह दौरा कुछ सैकेंड या मिनट तक रहता है, पर दिल को दहला कर रख जाता है। इसे ही जनरलाइज्ड कनवलसिव सीज़र कहा जाता है। | कुछ मामलों में दौरा मस्तिष्क के ऐसे हिस्से में उठता है कि सिर्फ अनुभूति, संवेदना या संज्ञा के स्तर पर उसका प्रभाव व्यक्त होता है। आँखें खुली रहती हैं, पर होश-हवास नहीं रहता। कुछ सुधबुध नहीं रहती कि आसपास क्या हो रहा है। यह पेटिट मॉल एपिलेप्सी भी कुछ सैकेंड या मिनट तक ही रहती है। | रूप कुछ भी हो, मिरगी का संबंध मस्तिष्क में जागी विद्युत हलचल से ही होता है। कुछ में हलचल मस्तिष्क के किसी रोग से संबंध रखती है, तो कुछ में मस्तिष्क की जटिल जैव-रासायनिकी और विद्युत गतिविधि से।

लेकिन यहाँ यह बात साफ कर देना भी जरूरी है कि मिरगी की तरह दिखने वाला हर दौरा मिरगी नहीं होता। कभी एकाध बार किसी भी व्यक्ति को दौरा पड़ सकता है। कुछ खास शारीरिक और मानसिक स्थितियाँ इसे पैदा कर सकती हैं। | मिरगी अपने में एक चिरव्याधिकारक रोग है। इसमें दौरों की समय-समय पर पुनरावृत्ति होती रहती है। पर अधिकांश रोगी उपयुक्त अवसर मिलने पर इस व्यवधान के बावजूद सामान्य जीवन गुजर-बसर कर सकते हैं।

क्या मिरगी एक आम रोग है? यह किस उम्र में शुरू होता है?

मोटे तौर पर लगाए गए कुछ अनुमानों के अनुसार कुल जनसंख्या मे एक से दो प्रतिशित लोगो को यह रोग होता है यह रोग किसी भी उम्र में हो सकता है, लेकिन मामलों में शुरुआत अक्सर बचपन या किशोरावस्था में तीस साल के बाद पहला दौरा पड़े, तो उसे शक की देखा जाता है। पूरी जाँच-पड़ताल की जाती है कि कहीं पीछे कोई गंभीर रोग न हो।

क्या मिरगी पारिवारिक रोग है ? इसका आनुवंशिकी से क्या संबंध है ?

मिरगी का आनुवंशिकी से कितना गहरा संबंध है, यह ठीक-ठीक कह पाना मुश्किल है। सामान्य जनसंख्या की तुलना में रोगी के परिवार में मिरगी के मामले अधिक बड़ी संख्या में होते हैं। फिर भी यह संख्या इतनी बड़ी नहीं होती कि इसे बहुत गंभीरता से लिया जाए।


मिरगी के दौरे के लक्षण क्या हैं ?

मिरगी कई रूपों में प्रकट हो सकती है। इसका सबसे अधिक पाया जाने वाला रूप बैंड-माल एपिलेप्सी है। इसमें दौरा शुरू होते ही चेतना टूट जाती है, बेहोशी की हालत में रोगी गिर पड़ता है, पेशियों में पहले तनाव आता है फिर लगातार रुक-रुक कर ऐंठन। दाँती लग जाती है और जीभ दाता के बीच आकर कटने लगती है। आँखें पलट जाती हैं। शरा से मल-मूत्र त्याग हो सकता है। यह अवस्था कुछ स या मिनटों तक ही रहती है, फिर दौरा अपने-आप जाता है। पेशियाँ ढीली पड़ जाती हैं और होश लाट है। सोने के बाद वह अपने को कुछ बेहतर महसू है। हालाँकि कुछ समय तक उसके सोचने-विचारने की कमजोर बनी रहती है और सिर में जोरों का दर्द रह सकता है। उसे दौरे के विषय में कुछ याद नहीं रहता और कई बार कुछ पहले की बातें भी भूल जाती है कभी-कभी दौरे के कई दिनों बाद तक शरीर कमजोर ही बना रहता है। 9
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क्या ऐसे कोई लक्षण हैं जिनसे रोगी को यह पूर्वानुमान हो जाए। दौरा पड़ने वाला है ?

कुछ रोगियों को दौरे से तुरंत पहले इसका आभास हो जाता हैं। ये पूर्व -लक्षण कई प्रकार के हो सकते हैं। स्वभाव मे आई चिड़चिड़ाहट, मानसिक, उद्वेलन, पेट मे हड़बड़ी, टिमटिमाती रोशनी दिखना, कोई असामान्य सी गंध अनुभव करना जैसे जली हुई रबड़ की, या यह आभास होना की ऐसा ही अनुभव पहले भी हो चुका है, एस बात की चेतावनी हो सकते हैं की दौरा पड़ने वाला है। (
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दौरे का प्राथमिक उपचार क्या है ? क्या चमड़ा सुघाने से दौरा खत्म हो जाता है ?

आपके सामने किसी को दौरा पड़े तो घबराएँ नहीं। बिना किसी घड़बडाहट के इन बातों को अमल में लाएँ :

उसे गिरता देखें तो उसे चोट से बचाने की कोशिश करें। उसके आसपास कोई ऐसी चीज न पड़ी रहने दें जिससे उसे चोट लग सकती हो। पास में आग, पत्थर या कोई दूसरा संकट दिखे तो उसकी रक्षा करें।
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आसपास लोगों की भीड़ न लगने दें। उस तक ताजा हवा पहँचती रहे, यह जरूरी है। । दौरे के दौरान उसकी जीभ न कटे, इस उद्देश्य से कोई साफ कपड़ा जैसे रूमाल गोल लपेट कर उसके दाँतों के बीच में रख दें।

दौरा ठंडा होने पर उसे एक करवट लिटा दें। ताकि भीतर से निकली लार, रेशा, बलगम, आदि अंदर साँस की नली में न जाएँ।

जब तक उसकी हालत में सुधार न आए, उसे अकेला न छोड़े।

दौरे के दौरान उसके मुँह में पानी या कोई भी दूसरी चीज न डालें। न उसे हिलाएँ-डुलाएँ, न ही पकड़ने की कोशिश करें।

आमतौर से दौरा दो-तीन मिनट में खुद ठंडा पड़ जाता है। चमड़ा सुघाने से कोई लाभ नहीं पहुँचता। यदि दौरा लंबा खिंचता दिखे तो तुरंत डॉक्टरी सहायता लें। डॉक्टर डायजीपाम का टीका देकर दौरे को शांत कर सकता है।


पहली बार दौरा पड़ने पर क्या करना चाहिए ? क्या किसी विशेषत: सलाह लेनी चाहिए ?

सबसे अच्छा होगा कि पास के किसी बड़े अस्पताल में जा न्यूरोलॅजिस्ट से जाँच कराई जाए। वह विधिपूर्वक शारीरिक हैं। करके ही बहुत कुछ पता लगा सकता है। सी.टी. और ए. आर. आई. स्कैनिंग की सुविधा होने पर इनमें से कम-से-कम एक प्रकार की जाँच भी जरूरी है। इससे यह साफ हो जाता है कि सिर में कोई दूसरा रोग तो नहीं, जिससे दौरा हुआ था। । मामले को ठीक से समझने के लिए विशेषज्ञ इलैक्ट्रो एनसेफलोग्राम (ई.ई.जी.) भी करवाता है। ठीक वैसे ही जैसे ई. सी.जी. से दिल की परख की जाती है, ई.ई.जी. में मस्तिष्क की विद्युत-रिकॉर्डिंग उतारी जाती है। इससे कई बातें खुल कर सामने आ जाती हैं, जैसे क्या यह मिरगी ही है ? यह क्यों हुई ? और यह किस किस्म की है ? लेकिन इसका सामान्य होना यह पुष्टि नहीं करता कि मामला मिरगी का नहीं था।
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कई बार विशेष परििस्थतियाँ पैदा करके भी ई ई जी, लिया जाता है जैसे नींद में, कौधती रोशनी दिखा कर या सॉस लेने की गति तेज करके, ताकि असामान्यताएँ दिख सके और मिगी। का निदान सिद हो सके।

मिरगी का इलाज क्या है ?

का इलाज कई बातों को ध्यान में रखकर किया जाता है। मूल लक्ष्य यह होता है कि यदि कोई ठोस कारण हो तो उसे दूर किया जाए. और यदि कोई निश्चित कारण न मिल पाए तो दवा से को रोका जाए। साथ में ऐसी सावधानियां भी बताई जाएँ जिनसे पडने की दर कम हो जाए और व्यक्ति सामान्य रूप से जीवन व्यतीत कर सके।

जैसे यदि मस्तिष्क में टी.बी. या कोई दूसरा संक्रमण (इन्फे है, तो उसका इलाज; ट्यूमर है तो उसका ऑपरेशन, धमनी या शिरा का विकार है तो उसकी सर्जरी करा लेने से दौरे पड़ने बंट हो जाते हैं। | लेकिन जिनमें ऐसा कोई कारण नहीं मिलता उनमें भी दौरे रोके जा सकते हैं।
(पीलिया)

मिरगी के दौरे को कैसे रोका जा सकता है?

दौरों को रोकने के लिए कई प्रभावशाली दवाएँ हैं। जैसे फेनिटॉअन, कार्बामेजापिन, फिनोबार्बिटॉल, प्राइमीडॉन, सोडियम वेल्पोरेट, इथोसक्सामाइड, क्लोनाजेपाम, ट्राइमेथाडाओन। रोग की उग्रता, रूप तथा व्यक्ति के वजन के मुताबिक इनमें से एक या अधिक दवा उपयुक्त मात्रा में देने से लगभग तीन-चौथाई मामलों में दौरों को रोका जा सकता है। प्रयास यह होता है कि दवा कम-से-कम मात्रा में दी जाए, जिससे दौरे पड़ने बंद हो जाएँ और दवा का कोई दुष्प्रभाव न हो।

यद्यपि अनुभव से कई बातें स्पष्ट हो चुकी हैं, फिर भी पहले से यह नहीं बताया जा सकता कि किस रोगी में कौन सी दवा सबस अच्छा असर दिखाएगी। इसलिए शुरू के दिनों में दवा की मात्रा या दवा भी बदलनी पड़ सकती है।

दवा का असर बनाए रखने के लिए उसे सालों साल तक नियम से लेना पड़ता है, और डॉक्टर की राय लिए बगैर उसकी मात्रा तक बदलना गलत है। यह सोचकर कि कोई दूसरा रोगी किसी दूसरा दवा से अधिक स्वस्थ रहता है, दवा में परिवर्तन करना बिलकु गलत है। दवा से कोई असंतोष हो, कोई साइड-इफैक्ट नजर आए। तो डॉक्टर को बताना चाहिए। डॉक्टर उसमें आवश्यक परिवर्तन कर सकता है।

मिरगी की दवा कब तक चलती है ?

कुछ रोगियों को पूरी उम्र दवा लेनी पड़ती है। लेकिन जिन्हें दौरे पड़ने बिलकुल बंद हो जाते हैं, उनमें से पचास प्रतिशत से अधिक रोगियों की दवा बंद हो जाती है और वे फिर भी रोगमुक्त रहते हैं। | जिन रोगियों को पिछले चार वर्षों में एक बार भी दौरा नहीं पड़ा होता, जिनके दौरे एक ही दवा से रुक जाते हैं, जिनका ई. ई. जी. सामान्य होता है, मस्तिष्क में कोई विकृति नहीं होती, उनमें दवा बंद करने की अच्छी संभावना होती है। फैसला डॉक्टर को ही लेना होता है और फ़िर भी दवा एकदम बंद नहीं की जाती, बल्कि धीरे-धीरे घटाते हुए तीन से छह महीनों में उसे पूरी तरह रोका जाता है।

इस रोग में क्या-क्या सावधानियाँ जरूरी हैं ?

सबसे जरूरी है कि दवा नियम से लें। भूलें या टालें नहीं। कहीं बाहर जाएँ तो दवाएँ साथ ले जाएँ। ये दवाएँ बगैर डॉक्टर की पर्ची के नहीं मिलतीं। दवा से दौरे नियंत्रण में हों, तब भी हर तीन से छह महीनों पर डॉक्टर को जरूर दिखाएँ।
जीवन में अनुशासन बरतें। रोज समय से सो जाएँ। अधिक थकान और मानसिक तनाव अस्वास्थ्यकर हैं। लापरवाही बरतने से दौरा पड़ सकता है। स्वस्थ संतुलित खान-पान लें । यह न सोचें कि किसी प्रकार के प्रतिबंध हैं। हाँ, शराब से जरूर बचें। समय से खाना-पीना भी बहुत जरूरी है। उपवास अच्छा नहीं है। इससे खून में ग्लुकोस कम हो सकता है, जिससे दौरा पड़ सकता है। टेलीविजन, टिमटिमाती रोशनी, निओन साइन कुछ लोगों में दौरा पैदा कर देते हैं।
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जिस बच्चे को मिरगी हो, क्या वह पढ़-लिख सकता है?

बिलकुल ! अधिकतर बच्चों की बौद्धिक क्षमता बिलकुल सामान्य होती है और वे बहुत आसानी से पढ़ाई में हर बुलंदी हासिल कर सकते हैं। अध्यापकों और अभिभावकों को यह बात हमेशा ध्यान में रखनी चाहिए। कुछ स्कूल यदि इन बच्चों को अपने प्रांगण में लिखने-पढ़ने का मौका नहीं देते, तो यह सरासर गलत है।

क्या मिरगी का रोगी सामान्य काम काज करने लायक होता है?

बिलकुल ! सिर्फ उसे कोई ऐसा व्यवसाय नहीं चुनना चाहिए जिसमें दौरा पड़ने पर उसे खतरा हो। मसलन फैक्टरी में मशीनों पर काम करना, अग्निशमन कर्मचारी के रूप में कार्य करना, ड्राइविंग करना आदि।

क्या मिरगी के रोगी के लिए विवाह करना उचित है?

क्यों नहीं । यदि कोई योग्य और समझदार जीवन-साथी मि गृहस्थी बसाने में कोई बाधा नहीं आती।

क्या मिरगी से पीड़ित रही स्त्री माँ बन सकती है?

हाँ, पर इस बारे में निश्चित मन बनाने से पहले और डॉक्टर की राय ले लेनी चाहिए। यदि दवा लेने के दौरान गर्भधारण हो तो हो सकता है दवा की खुराक बढ़ानी पड़े।

यदि दौरे पड़ना बंद हो जाएँ, तो क्या फिर ड्राइविंग की जा सकती है ?

इस पर हर देश के अपने नियम हैं। लेकिन दो साल से (दवा या दवा के बगैर) दौरा नहीं पड़ा हो, तो ड्राइविंग शुरू की जा सकती है। इसके बारे में अपने डॉक्टर से स्पष्ट राय लेनी चाहिए, क्योंकि ड्राइविंग करते हुए यदि दौरा पड़ जाए, तो न सिर्फ अपने लिए बल्कि दूसरों के लिए भी खतरा पैदा हो सकता है।


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