Miscarriage गर्भपात के लक्षण कारण प्रकार बचाव और उपचार

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गर्भपात (Miscarriage)Recurrent miscarriage, abortion, signs of miscarriage,abortion,early signs of pregnancy discharge,conception symptoms,miscarriage causes,

गर्भपात क्या है?What is Miscarriage?

यदि गर्भ अपने प्राकृतिक समय से पूर्व गर्भाशय से निकल जाए तो उसे गर्भपात कहते है।

इसको साधारण ग्रामीण बोल-चाल में हमल गिर जाना, बालक गिरना या कच्चा पड़ना भी कहा जाता है। वैद्य समाज में इसे गर्भस्राव भी कहा जाता है।

यदि तीसरे से चौथे मास के अंदर या तीसरे ही मास के अंदर गर्भ सावित होकर गिर जाए तो उसको गर्भस्राव कहते हैं।

 

 

What is miscarriage?
                     What is miscarriage?

पांचवें से छठे मास के अंदर गर्भ गिरकर समाप्त हो जाए तो उसे गर्भपात तथा सातवें मास से लेकर सजीव भ्रूण का यदि नवें या दसवें मास से पहले प्रसव हो जाए तो उसे अकाल-प्रसव कहा जाता है।

गर्भपात होने के कारण Causes of Miscarriage?

गर्भपात के कारणों को मुख्यतः चार भागों में बांटा जाता है।

1– बाहरी कारण: (External Causes Abortion)

    • गर्भवती के पेट पर चोट लगना,
    • गर्भावस्था में अत्यधिक परिश्रम,
    • तंग व कसे हुए कपड़े पहनना
    • बालों का जूड़ा बनाना
    • तंग जूती या चप्पल पहनना
    • गिर जाना
    • गाड़ी पालकी नाव या रेलगाड़ी पर चढ़ने की दुर्घटना
    • अधिक उछल-कूद या दौड़-भाग करना
    • आटा पीसना या चूरा कूटना
    • गर्भावस्था में भी अत्यधिक संभोग
    • किसी भारी वजन या वस्तु को उठाना
    • सीढ़ियों पर तेजी से चढ़ना
    • तेज रफ्तार की बैलगाड़ी या बस आदि की ऐसी सवारी करना जिसमें हिचकोले अधिक लगें
    • मूत्रल या दस्तावर दवाओं का अधिक प्रयोगगर्म औषधियों का सेवन
    • शरीर से कफ का अधिक मात्रा में निष्कासन
    • मौसम संबंधी गड़बड़ियां
    • अधिक लंबे समय का उपवास
    • संकीर्ण या नमी युक्त मकान में मैला-कुचैला रहना
    • डर, शोक, चिंता, अत्यधिक क्रोध, भयानक (डरावने) स्वप्न देखना
    • अधिक गर्म, अपचनीय, भारी खट्टे, वातकारी भोजन या नशीली दवाइयों (मादक द्रव्य) का अत्यधिक प्रयोग तथा गर्भावस्था में अन्य शिशु को दुग्धपान कराना इत्यादि।
causes of Miscarriage
Causes of Miscarriage

2-शारीरिक रोग (Internal Causes Miscarriage)

3- गर्भाशय के रोग और दोष: (Ovarian Disease Causes of Miscarriage)

    • गर्भाशय शोथ, गर्भाशय में पानी पड़ जाना, श्वेतप्रदर,
    • गर्भाशय की रसौली
    • गर्भाशय का कैंसर
    • मासिक धर्म की अनियमितता
    • हिस्टीरिया
    • गर्भाशय का सज जाना या टेढा हो जाना
    • गर्भाशय में दूषित पदार्थ एवं स्रावों की अधिकता
    • गर्भाशय की कमजोरी
    • गर्भाशय की रचना में चर्बी की अधिकता
    • प्रोजैस्ट्रोन नामक हारमोन की कमी आदि।

4- भ्रूण संबंधी दोष: (Fetal defects Causes of Miscarriage)

    • भ्रूण कमजोर होना
    • आंवल का गर्भाशय से ठीक संबंध न होना
    • आंवल की रचना का चर्बी में बदल जाना
    • भ्रूण में तरल की अधिकता और झिल्लियों का तनाव
    • गर्भाशय में भ्रूण का मर जाना या भ्रूण का किसी रोग से पीड़ित होना इत्यादि

गर्भपात कितने प्रकार का होता है? Types of Miscarriage?

विभिन्न समय पर गर्भपात  को विभिन्न प्रकार व नाम से जाना जाता है। 

Abostuss– गर्भ ठहरने के 20 दिनों के अंदर गर्भ गिर जाए तो एबॉस्टस (Abostuss) कहा जाता है। 

Miscarriage- प्रथम 3 मास में गर्भ गिर जाए तो इसको गर्भस्राव (Miscarriage) कहते हैं।

Abortion-यदि गर्भ ठहरने के चौथे से सातवें मास तक गर्भ गिर जाए तो गर्भपात (Abortion) कहते हैं।

 

 गर्भ का स्वयं गिर जाना

कई बार गर्भवती स्त्री के किसी तीव्र रोग भागों तथा सख्त कमजोरी के कारण गर्भ गिर जाया करता है।

 

अपनी इच्छा से गर्भ गिराना 

कई बार किसी गर्भवती स्त्री की सख्त कमजोरी के कारण बच्चा पैदा होने पर उसकी मृत्यु की आशंका से चिकित्सक के परामर्शानुसार या कुंवारी लड़की या विधवा स्त्री के खराब चरित्र के कारण ठहरे हुए गर्भ को बदनामी से बचाने हेतु तथा कई बार विवाहित स्त्रियों द्वारा अधिक संतान मौजूद रहने के कारण स्वयं अपनी इच्छा से किसी चिकित्सक या घरेलू औषधियों द्वारा गर्भ गिरा दिया जाता है। 

 

अवस्थानुसार गर्भपात के प्रकार।  Types of Abortion by Condition?

संभावित या परिहार्य गर्भपात (Potential or avoidable Abortion)

गर्भपात, गर्भ के समय रक्तस्राव प्रारंभ होकर शीघ्र ही बंद हो जाए, किंतु गर्भपात न हो, अर्थात ऐसी अवस्था का पैदा हो जाना जबकि गर्भपात होने का भय हो जाए।


अपरिहार्य गर्भपात (Inevitable Abortion)

ऐसी अवस्था का पैदा हो जाना जब गर्भपात होना अनिवार्य हो और उसको प्रयत्न करने पर भी रोका न जा सके, अर्थात रक्त अत्यधिक मात्रा में निकल चका हो, रक्त के साथ गर्भ का कुछ भाग बाहर निकल गया हो, गर्भाशय का मुख बहुत अधिक खुल चुका हो तथा दर्द भी अधिक हो। 

लीन गर्भपात (Lean Abortion)

गर्भाशय में भ्रूण का मर जाना, किंतु उसका एक ही बार में बाहर न निकलना। ऐसी परिस्थिति में थोड़ा-थोड़ा बदबूदार स्राव हर समय निकलता रहता है। इसके साथ ही रुग्णा की कमर और पेडू में दर्द, अंग टूटना, मामूली ज्वर, अजीर्ण, भूंख  की कमी, मितली तथा शारीरिक कमजोरी आदि लक्षण उत्पन्न हो जाते हैं और अंत  में गर्भपात हो जाता है या मृत बच्चे को हाथ से या शल्य क्रिया द्वारा निकाला जाता है। 

संक्रामक गर्भपात (Post-Abortion infection) 

ऐसी अवस्था में बहुत अधिक रक्तस्राव हो जाता है, बदबूदार स्राव भी होता रहता है एवं ज्वर भी हो जाता है। गर्भाशय तथा योनि में शोथ हो जाता है। इसका कारण संक्रमण Infection होता है। यह अवस्था घातक भी सिद्ध हो सकती है। यह स्थिति प्रायः स्वयं की इच्छा से गर्भ गिरने की अवस्था में होती है। 

स्वाभाविक गर्भपात (Recurrent Abortion)

इसको बारंबार होने वाला गर्भपात भी कहा जाता है। इसमें स्त्री को बार-बार गर्भपात हो जाता है। एक बार गर्भ गिर जाने के बाद, स्त्री को जब भी पुनः गर्भ होता है, उसे गर्भ गिरने की आदत (बीमारी) हो जाती है। ऐसा प्रायः गर्भ स्थिति के तीसरे या चौथे माह में होता है। इसका कारण प्रायः उपदंश, सूजाक, गर्भाशय की म्यूकस मेम्बरीन के विकार और दोष, गर्भाशय की कमजोरी, गर्भाशय का पुराना शोथ, गर्भाशय की रसौली आदि हैं।

 

गर्भपात के लक्षण Symptoms of Abortion or Miscarriage? 

गर्भपात के लक्षणों को मुख्यरूप से  तीन अवस्थाओं में विभक्त किया गया है। 

              Early sign of Miscarriage

प्रथम अवस्था

गर्भपात से पूर्व गर्भवती सुस्त और निढाल-सी हो जाती है, समस्त शरीर में दर्द तथा कमर व पेडू में भारीपन, भूख की कमी, कब्ज, बेचैनी, अशांति, सिर में दर्द एवं मामूली ज्वर हो जाता है, जो बराबर बढ़ता रहता है। दर्द रुक-रुककर उठता है तथा प्रसव पीड़ा की भांति होता है।  

द्वितीय अवस्था

गर्भाशय से रक्त आने लग जाता है तथा इसकी मात्रा क्रमशः बढ़ती ही चली जाती है। स्तनों की कठोरता कम होने लगती है और वे ढीले-ढीले-से एवं छोटे-छोटे होने लग जाते हैं। पीड़ित स्त्री के गुप्तांगों में भी ढीलापन आने लगता है। गर्भाशय नीचे की ओर आ जाता है तथा इसका मुख खुल जाता है। 

तृतीय अवस्था

इस अवस्था में दर्द बहुत अधिक हो जाता है तथा रक्त के टुकड़े-टुकड़े अत्यंत कष्ट और दर्द के साथ थोड़े-थोड़े समय के बाद निकलते रहते हैं। सिर चकराने लगता है तथा आंखों के सामने अंधेरा छाने लगता है। समस्त शरीर में कंपकंपी तथा दिल जोरों से धड़कने लगता है। हाथ, पैर तथा शरीर ठंडा हो जाता है। प्रायः तेज ज्वर भी हो जाता है। कभी-कभी कै और मितली भी होती है और अंत में भ्रूण निकल जाता है। (YouTube)

 

गर्भपात से बचने के उपचार? Treatment of Miscarriage (Abortion)? 

नीचे दिये गए कुछ उपायों को आप उपयोग मे लाकर गर्भपात जैसी जैसी भयानक समस्या से बच सकते हैं। 

  • गर्भवती स्त्रियों को पेटा खिलाने से गर्भपात से बचने में सहायता मिलती है तथा बच्चा भी स्वस्थ होता है।
  • 100 ग्राम अनार के ताजा पत्ते पीसकर पानी में छानकर पिलाने और पत्तों का रस पेड़ पर लेप करने से गर्भस्राव रुक जाता है। (अनार के सूखे छिलके पीसकर छानकर इसको 1 चम्मच की मात्रा में ठंडे पानी से 2 बार लेने से अत्यधिक मासिक स्राव होना यानी रक्तस्राव बंद हो जाता है।)
  • यदि गर्भपात का भय हो तो काले चनों का काढ़ा सेवन करना लाभकारी रहता है। 
  • लौकी के कच्चे गूदे पर पिसी हुई मिसरी डालकर खाने से यक्ष्मा (टी.बी.) रोग ठीक हो जाता है तथा गर्भपात होने की भी संभावना नहीं रहती।

  • गर्भाशय की निर्बलता के कारण यदि गर्भ नहीं ठहरता हो या गर्भस्राव हो जाता हो तो कुछ सप्ताह ताजे सिंघाड़े खाने से लाभ होता है। 

  • पिसी हुई फिटकरी चौथाई चम्मच-भर एक कप दूध में डालकर लस्सी बनाकर स्त्री को पिलाने से गर्भपात रुक जाता है। गर्भपात के समय जब रोगिणी को दर्द व रक्तस्राव हो रहा हो तो प्रत्येक 2-2 घंटे के अंतराल से 1-1 मात्रा सेवन कराएं। 

  • गर्भधारण करने के बाद 62 ग्राम सौंफ + 31 ग्राम गुलाब का गुलकंद पीसकर पानी मिलाकर एक बार प्रतिदिन पिलाने से गर्भपात रुकता है। (गर्भकाल में सौंफ का अर्क पीते रहने से गर्भ स्थिर रहता है।) 

  • 12 ग्राम जौ का छना हुआ आटा, 12 ग्राम तिल और 12 ग्राम शक्कर महीन पीसकर शहद में मिलाकर चाटने से गर्भपात नहीं होता। 

  • बार-बार गर्भ गिर जाता हो तो कमर में 4 उंगल की धतूरे की जड़ बांधना हितकर है। 

  • तीसरे महीने यदि गर्भपात का भय हो तो नागकेसर के चूर्ण में मिसरी मिलाकर दूध के साथ खाना लाभकारी है।

 

गर्भपात से बचने के उपाए?How to prevent Miscarriage or Abortion? 

  • एक बार गर्भपात से पीड़ित स्त्री को अगली बार गर्भधारण से पहले महिला चिकित्सक से परीक्षण अवश्य कर लेना चाहिए।
  • स्त्री को शारीरिक रूप से बलिष्ट होने पर गर्भधारण करना चाहिए।
  • रक्ताल्पता होने पर पहले रक्ताल्पता को नष्ट करने के बाद गर्भधारण करना चाहिए।
Diet during pregnancy
                    Diet during pregnancy
  • गर्भावस्था में गर्भवती को अधिक पौष्टिक खाद्य पदार्थों का सेवन करना चाहिए।
  • भोजन में हरे पत्ते वाले शाक व सब्जियों का खूब सेवन करना चाहिए। फल व फलों का रस सेवन करने से शरीर बलिष्ठ होता है।
  • गर्भवती स्त्री को प्रतिदिन सुबह-शाम सैर के लिए निकलना चाहिए। प्रातः शुद्ध वायु से शरीर को शक्ति मिलती है, रक्त शुद्ध होता है और मन प्रसन्न रहता है। 

 

About Daya Shankar

I am Living in Delhi and I am a Medical Student.
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